सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई, मरहूम हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन हाजी सैयद जव्वाद हुसैनी ख़ामेनेई के पुत्र, 19 अप्रैल 1939 को पवित्र नगर मशहद में जन्मे। वे परिवार के दूसरे पुत्र थे।
मरहूम सैयद जव्वाद ख़ामेनेई का जीवन अनेक उलेमा की तरह अत्यंत सादा और ज़ाहिदाना था। आयतुल्लाह ख़ामेनेई अपनी ज़िंदगी के उन दिनों को याद करते हुए फ़रमाते हैं:
“मेरे पिता, एक प्रसिद्ध धार्मिक व्यक्तित्व होने के बावजूद, अत्यंत सादा जीवन व्यतीत करते थे। हमारा जीवन बहुत कठिन था। मुझे याद है कि कभी-कभी रात के भोजन के लिए हमारे पास केवल रोटी और किशमिश होती थी, जिसे हमारी माता किसी न किसी तरह उपलब्ध कराती थीं।”
जिस घर में यह परिवार रहता था, वह एक ग़रीब मोहल्ले में स्थित था:
“हमारा घर लगभग पैंसठ वर्ग मीटर क्षेत्र में था, जिसमें केवल एक कमरा और एक अंधेरा तहख़ाना था। जब कभी लोग मेरे पिता से धार्मिक या सामाजिक विषयों के संबंध में मिलने आते, तो परिवार को तहख़ाने में जाना पड़ता था ताकि मुलाक़ात पूरी हो सके। बाद में कुछ नेकदिल लोगों ने हमारे घर के साथ वाली खाली ज़मीन ख़रीद ली, जिससे हम दो और कमरे बनाने में सक्षम हुए।”
उनके पिता, आयतुल्लाह सैयद जव्वाद हुसैनी ख़ामेनेई, 7 दिसंबर 1895 ईस्वी को नजफ़ अशरफ़ में जन्मे और 5 जुलाई 1986 ईस्वी को उनका निधन हुआ। वे अपने समय के प्रतिष्ठित उलेमा और मुज्तहिदीन में गिने जाते थे, जो बाद में अपने परिवार के साथ तबरीज़ चले गए।
सतह की शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने 1918 ईस्वी में मशहद मुक़द्दस की ओर हिजरत की। फ़िक़्ह और उसूल में उन्होंने हाज आगा हुसैन क़ुम्मी, मिर्ज़ा मुहम्मद आक़ाज़ादा ख़ुरासानी “किफ़ाई”, मिर्ज़ा महदी इस्फ़हानी और हाज फ़ाज़िल ख़ुरासानी जैसे महान उस्तादों से ज्ञान प्राप्त किया। दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में उन्होंने आका बुज़ुर्ग हकीम मशहदी और शेख असदुल्लाह यज़्दी से शिक्षा हासिल की।
इसके बाद 1927 ईस्वी में वे नजफ़ अशरफ़ गए, जहाँ उन्होंने मिर्ज़ा मुहम्मद हुसैन नाइनी, सैयद अबुलहसन इस्फ़हानी और आका ज़िया उद्दीन इराक़ी के दर्सों से लाभ उठाया। इन्हीं महान हस्तियों ने उन्हें इज्तेहाद की अनुमति भी प्रदान की।
फिर उन्होंने ईरान लौटने का निर्णय लिया और मशहद मुक़द्दस में निवास ग्रहण किया, जहाँ वे जीवन के अंतिम दिनों तक रहे। शिक्षण कार्य के साथ-साथ उन्हें मशहद बाज़ार की मस्जिद सद्दीकीहा (जो अज़रबैजानियों की मस्जिद के नाम से भी प्रसिद्ध थी) में इमामत-ए-जमाअत की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। वे मस्जिद गोहरशाद के इमामों में भी शामिल थे।
उन्हें अध्ययन और अनुसंधान का अत्यधिक शौक़ था। उनके विद्वान साथियों में हाज मिर्ज़ा हुसैन आबाई, हाज सैयद अली अकबर ख़ुई, हाज मिर्ज़ा हबीब मलिकी और अन्य प्रतिष्ठित अहल-ए-इल्म शामिल थे, जिनके साथ वर्षों तक वैज्ञानिक और धार्मिक चर्चाएँ तथा अनुसंधान जारी रहे। वे अत्यंत परहेज़गार, सांसारिक मामलों से निर्लिप्त और ज़ाहिदाना जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति थे।
इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद भी उन्होंने अपनी सादा और ज़ाहिदाना जीवनशैली को बनाए रखा, जबकि उनके पुत्र उच्च राजनीतिक और प्रशासनिक पदों पर आसीन थे। अपनी उच्च मानवीय विशेषताओं के कारण वे सदैव जनता के विश्वास का केंद्र बने रहे। उन्हें रौज़ा-ए-मुबारक इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के ज़रीह-ए-मुक़द्दस के पीछे स्थित एक रिवाक़ में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।
इमाम ख़ुमैनी रह. ने आयतुल्लाह ख़ामेनेई के नाम अपने शोक संदेश में, आयतुल्लाह सैयद जव्वाद ख़ामेनेई को एक “मुत्तक़ी और मुतअह्हिद आलिम-ए-दीन” क़रार दिया था।
ख़ानम ख़दीजा मीरदामादी का जन्म 1914 ईस्वी में हुआ और 1989 ईस्वी में उनका निधन हुआ। वे अत्यंत परहेज़गार, धार्मिक और विदुषी महिला थीं, जिन्हें क़ुरआनी आयतों, अहादीस, इतिहास और साहित्य का गहरा ज्ञान था। उन्होंने अपने बच्चों, विशेषकर आयतुल्लाह सैयद अली ख़ामेनेई, का पहलवी शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी गतिविधियों में पूरा साथ दिया।
आयतुल्लाह ख़ामेनेई अपनी माता के बारे में फ़रमाते हैं:
“मेरी माता अत्यंत बुद्धिमान, शिक्षित और अध्ययनशील महिला थीं, जिन्हें कविता और ललित कलाओं से भी गहरी रुचि थी। वे हाफ़िज़ शीराज़ी के कलाम से भली-भांति परिचित थीं। हालांकि मेरा आशय यह नहीं कि वे हाफ़िज़ की विशेषज्ञ थीं, बल्कि वे उनके अशआर का बड़े शौक़ से अध्ययन करती थीं। उन्हें क़ुरआन-ए-मजीद से गहरा लगाव था और उनकी आवाज़ अत्यंत मधुर और दिलनशीन थी।”
वे आगे फ़रमाते हैं:
“जब हम बच्चे थे, तो हम सब अपनी माता के चारों ओर बैठ जाते और वे हमें क़ुरआन-ए-मजीद पढ़कर सुनातीं। उनकी तिलावत अत्यंत सुंदर और प्रभावशाली होती थी। विभिन्न अवसरों पर वे अंबिया-ए-किराम अलैहिमुस्सलाम के जीवन से संबंधित आयतों की तिलावत करतीं। हज़रत मूसा, हज़रत इब्राहीम और अन्य नबियों के जीवन के बारे में मैंने सबसे पहले अपनी माता ही से सुना। जब भी वे क़ुरआन-ए-मजीद की तिलावत करतीं और अंबिया के नाम आते, तो वे हमें उनके बारे में विस्तार से समझाती थीं।
सैयद अली ख़ामेनेई ने चार वर्ष की आयु में अपनी शिक्षा का आरंभ किया। उन्हें मकतब भेजा गया, जहाँ उन्होंने पवित्र क़ुरआन की शिक्षा प्राप्त करना शुरू
किया। प्रारंभिक शिक्षा के लिए उन्होंने मशहद के पहले इस्लामी विद्यालय “दारुत्तालीम दियानती” में प्रवेश लिया। इसी दौरान उन्होंने मशहद के अनेक क़ारियों से पवित्र क़ुरआन की तिलावत और क़िराअत भी सीखी।
जब वे छठी कक्षा में थे, तभी उन्होंने प्रारंभिक हौज़वी शिक्षा का आरंभ किया। दीनि ज्ञान के प्रति उनकी गहरी रुचि और माता-पिता के प्रोत्साहन ने प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्हें इस ज्ञानमयी दुनिया में प्रवेश करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अपनी धार्मिक शिक्षा का सिलसिला मदरसा-ए-इल्मिया सुलेमान ख़ान में जारी रखा, जबकि कुछ प्रारंभिक पाठ अपने सम्मानित पिता से भी प्राप्त किए।
इसके बाद वे मदरसा-ए-नव्वाब में दाखिल हुए, जहाँ उन्होंने “सत्ह” की शिक्षा पूर्ण की। इसके साथ-साथ वे विद्यालयी शिक्षा भी जारी रखे हुए थे और हाई स्कूल तक अपनी आधुनिक शिक्षा प्राप्त की।
उन्होंने “मआलिमुल उसूल” की शिक्षा आयतुल्लाह सैयद जलील हुसैनी सिस्तानी से प्राप्त की तथा “शरह-ए-लुमअह” अपने सम्मानित पिता और मिर्ज़ा अहमद मुदर्रिस यज़दी से पढ़ी। इसी प्रकार “रसाइल”, “मकासिब” और “किफ़ायह” की शिक्षा अपने पिता तथा आयतुल्लाह हाज शैख हाशिम क़ज़वीनी से प्राप्त की।
सन 1955 में उन्होंने आयतुल्लाह सैयद मुहम्मद हादी मिलानी के दर्स-ए-खारिज में भाग लेना शुरू किया।
सन 1957 में वे नजफ़ अशरफ़ गए, जहाँ उन्होंने नजफ़ के हौज़ा-ए-इल्मिया के प्रसिद्ध उस्तादों, जैसे आयतुल्लाह सैयद मोहसिन हकीम, सैयद अबुलक़ासिम ख़ूई, सैयद महमूद शाह्रूदी, मिर्ज़ा बाक़िर ज़ंजानी और मिर्ज़ा हसन बुजनुर्दी के दर्सों में भाग लिया। किंतु उनके पिता इस बात पर सहमत नहीं थे कि वे नजफ़ अशरफ़ में अधिक समय तक ठहरें, इसलिए वे मशहद वापस लौट आए।
मशहद में उन्होंने एक वर्ष तक आयतुल्लाह मिलानी के दर्सों से लाभ प्राप्त किया। इसके बाद सन 1958 में अधिक ज्ञानार्जन और दीनि शिक्षा के उत्साह में वे हौज़ा-ए-इल्मिया क़ुम चले गए। उसी वर्ष क़ुम प्रस्थान से पहले आयतुल्लाह मुहम्मद हादी मिलानी ने उन्हें इजाज़त-ए-रिवायत भी प्रदान की।
क़ुम में सैयद अली ख़ामेनेई ने महान विद्वानों, जैसे आयतुल्लाह सैयद हुसैन बुरुजेर्दी, इमाम ख़ुमैनी, हाज शैख मुर्तज़ा हायरी यज़दी, सैयद मुहम्मद मुहक्किक दामाद और अल्लामा तबातबाई जैसे उस्तादों से ज्ञान प्राप्त किया।
क़ुम में अपने प्रवास के दौरान उन्होंने अधिकांश समय अनुसंधान, अध्ययन और अध्यापन में व्यतीत किया।
सन 1964 में अपने सम्मानित पिता की दृष्टि संबंधी समस्याओं के कारण उनकी सेवा और सहायता हेतु उन्हें पुनः मशहद लौटना पड़ा। मशहद वापसी के बाद उन्होंने एक बार फिर आयतुल्लाह मिलानी के दर्सों में भाग लेना शुरू किया, जो सन 1970 तक जारी रहा।
मशहद पहुँचते ही उन्होंने “रसाइल”, “मकासिब” और “किफ़ायह” जैसी पुस्तकों के आधार पर फ़िक़्ह और उसूल के उच्च स्तरीय पाठों का अध्यापन प्रारंभ कर दिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने आम लोगों के लिए तफ़्सीर-ए-क़ुरआन के दर्स भी आयोजित किए। इन दर्सों में युवाओं, विशेषकर विद्यार्थियों की बड़ी संख्या भाग लेती थी।
अपने तफ़्सीर के दर्सों में आयतुल्लाह ख़ामेनेई पवित्र क़ुरआन की आयतों के प्रकाश में इस्लामी चिंतन और दर्शन के मूल सिद्धांतों को स्पष्ट करते थे। वे इन दर्सों में क्रांतिकारी संघर्ष और ताग़ूती व्यवस्था के अंत की आवश्यकता पर इतना अधिक बल देते थे कि उनके विद्यार्थी और श्रोता इस निष्कर्ष पर पहुँचते थे कि देश में इस्लामी शिक्षाओं पर आधारित शासन स्थापित होना चाहिए।
इन तफ़्सीर के दर्सों के आयोजन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य इस्लामी क्रांति के सिद्धांतों और विचारों को समाज तक पहुँचाना भी था। सन 1968 में उन्होंने उलेमा और तलबा के लिए उच्च स्तरीय तफ़्सीर के दर्सों की शुरुआत की, जो 1987 तक जारी रहे। हालांकि, ईरानशहर में गिरफ़्तारी और निर्वासन के दौरान यह सिलसिला कुछ समय के लिए प्रभावित हुआ।
उनके तफ़्सीर के दर्स उनके राष्ट्रपति काल के बाद भी जारी रहे।
सन 1990 में उन्होंने दर्स-ए-ख़ारिज़ की शिक्षा देना प्रारंभ किया, और उसके बाद से वे जिहाद, क़िसास, मकासिब और नमाज़-ए-मुसाफ़िर जैसे विषयों पर फ़िक़्ही दर्स देते रहे हैं।
आयतुल्लाह ख़ामेनेई को कविता और साहित्य से गहरी परिचितता है तथा उन्हें सदैव उपन्यासों और कथा-साहित्य के अध्ययन में विशेष रुचि रही है। उन्होंने विश्व के प्रसिद्ध उपन्यासों और साहित्यिक कृतियों का अध्ययन किया है। उपन्यासों, महान साहित्यकारों की रचनाओं तथा पूर्वी और पश्चिमी राष्ट्रों के इतिहास और संस्कृति के अध्ययन का यह शौक आज भी बरकरार है।
वे साहित्यिक आलोचना और कविता से भी जुड़े रहे हैं तथा अनेक कवियों, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों से उनके निकट संबंध रहे हैं। मशहद में प्रवास के दौरान वे साहित्यिक बैठकों में भाग लेते थे, जहाँ प्रतिष्ठित कवि उपस्थित होते थे। इन सभाओं में वे कविता पर आलोचनात्मक चर्चा भी किया करते थे।
आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने अपनी पहली कविता सन 1955 या 1956 में लिखी और हाल के वर्षों में उन्होंने “अमीन” तख़ल्लुस का प्रयोग किया है। लंबे समय तक उनके पास दो नोटबुकें रहती थीं। एक में वे उत्कृष्ट ग़ज़लें और दूसरी में प्रभावशाली शेर लिखते थे।
इतिहास की पुस्तकों का अध्ययन भी उनकी वैज्ञानिक और बौद्धिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण भाग रहा है तथा समकालीन इतिहास के विषयों और चर्चाओं पर उन्हें गहरी पकड़ प्राप्त है।
आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने अरबी साहित्य में उच्चतम स्तर तक दक्षता प्राप्त की, और विशेष रूप से नह्व की पुस्तक “मुग़्नी” तथा बलाग़त की पुस्तक “मुतव्वल” से उन्हें अत्यधिक लगाव था। “मुतव्वल” उनके सबसे प्रिय दर्सों में से एक थी। उनके अपने शब्दों में:
“मैं इस भाग के विषयों के साथ जीता था और मेरी आत्मा उससे परिपूर्ण हो जाती थी। आज भी कभी-कभी उसके कुछ अशआर गुनगुनाता हूँ।”
उन्होंने इतिहास और इतिहास-ए-अदब के क्षेत्र में अरबी की महान विश्वकोशीय कृतियों का अध्ययन किया और प्रत्येक पुस्तक के पिछले आवरण पर अपने हाशिये और टिप्पणियाँ लिखीं। हालांकि, समग्र रूप से आधुनिक अरबी साहित्य उनकी रुचि को पूरी तरह आकर्षित न कर सका। जैसा कि वे फ़रमाते हैं:
“इसके कुछ भागों में मुझे ऐसी बातें मिलीं जो अरबी ज़ौक़ और अरबी भाषा के विरुद्ध थीं। विशेष रूप से उस शैली का उल्लेख करना चाहिए जो यूरोपीय साहित्य की शैली और विषयवस्तु से प्रभावित है, जो न अरबी साहित्य है और न यूरोपीय साहित्य, बल्कि एक विकृत रूप है, जिसे हर स्वस्थ प्रकृति और शुद्ध रुचि रखने वाला व्यक्ति अस्वीकार कर देता है।”
वे आगे फ़रमाते हैं:
“मैंने समकालीन मिस्री, सीरियाई और इराक़ी साहित्यकारों और कवियों की रचनाएँ पढ़ी हैं, लेकिन अपनी मनचाही चीज़ मुझे इराक़ी कवि मुहम्मद महदी अल-जवाहिरी के काव्य में मिली।”
आयतुल्लाह ख़ामेनेई का क़ुरआन से गहरा संबंध बचपन से ही था। प्रारंभिक आयु में अपनी माता की क़ुरआन की तिलावत सुनने के बाद, उनके पिता ने उन्हें, जब वे अभी प्राथमिक विद्यालय में थे, हाजी रमज़ान बनकदार के सुपुर्द किया, जो मशहद के प्रसिद्ध क़ारियों में से थे। उन्होंने इतनी तेज़ी से प्रगति की कि अंततः उनके उस्ताद ने कहा:
“अब मेरे पास तुम्हें सिखाने के लिए कुछ नया बाकी नहीं रहा।”
इसके बाद वे मुल्ला अब्बास के शिष्य बने, जो मशहद के सबसे बड़े क़ारी थे और सैयद मुहम्मद अरब ज़ाफ़रानी के शिष्य थे, जिन्हें मशहद में इल्म-ए-क़िराअत का संस्थापक माना जाता है।
इन्हीं प्रारंभिक विद्यालयी वर्षों में, जब आयतुल्लाह काशानी मशहद आए, तो स्वागत समारोह में क़ुरआन की तिलावत करने वाले युवा सैयद अली ख़ामेनेई स्वयं थे।
सन 1948–49 में, जब उनकी आयु केवल नौ वर्ष थी, उन्होंने आयतुल्लाह नूरुद्दीन के स्वागत के अवसर पर भी मशहद में ख़्वाजा अबासल्त की दरगाह में पवित्र क़ुरआन की तिलावत की।
आयतुल्लाह ख़ामेनेई अपनी यादों में फ़रमाते हैं:
“क़ारियों की आवाज़ें सुनने के लिए हम ‘सौतुल अरब’ रेडियो स्टेशन लगाया करते थे। मेरे पास आज भी एक क़ुरआन मौजूद है, जिसके पिछले हिस्से पर मैंने लिखा है: ‘आज मुस्तफ़ा इस्माईल ने तिलावत की’, ‘आज अली अल-बन्ना ने तिलावत की’। हम बड़ी मुश्किल से रेडियो काहिरा पकड़ते थे। हमारे एक परिचित मिस्र गए थे और वहाँ से एक-दो कैसेटें लेकर आए थे।”
इसी तल्लीनता के साथ सुनने के माध्यम से वे राग़िब मुस्तफ़ा की आवाज़ से भी परिचित हुए। सन 1967–1968 के दौरान, मशहद में रहते हुए, वे अरब देशों के रेडियो स्टेशनों—विशेष रूप से रेडियो मिस्र—पर शैख़ मुस्तफ़ा इस्माईल की तिलावतें खोजा करते थे।
धीरे-धीरे सैयद अली ख़ामेनेई और उनके मित्रों को क़ुरआनी तिलावतों की रिकॉर्डिंग्स उपलब्ध होने लगीं और वे नए क़ारियों से भी परिचित होते गए।
आयतुल्लाह ख़ामेनेई के परिवार में मौजूद धार्मिक और राजनीतिक वातावरण ने उन्हें भविष्य की धार्मिक-राजनीतिक गतिविधियों के लिए तैयार कर दिया था। उनकी राजनीतिक गतिविधियों की शुरुआत उस समय हुई जब एक युवा मदरसा छात्र के रूप में मशहद में उनकी मुलाकात प्रसिद्ध इस्लामी क्रांतिकारी सैयद मुजतबा नवाब सफवी (मीरलौही) से हुई। स्वयं आयतुल्लाह ख़ामेनेई के अनुसार, इसी मुलाकात ने उनके भीतर क्रांति की पहली चिंगारी पैदा की।
इमाम ख़ुमैनी से उनकी पहली मुलाकात सन 1336 हिजरी शम्सी में हुई, और प्रांतीय परिषदों के विधेयक से संबंधित घटनाओं के दौरान वे इमाम ख़ुमैनी के राजनीतिक दृष्टिकोण और संघर्ष से परिचित हुए।
आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने सन 1963 में ताग़ूती शासन के विरुद्ध संघर्ष के विभिन्न क्षेत्रों में कदम रखा। वे उन प्रारम्भिक व्यक्तित्वों में शामिल थे जिन्होंने 5 जून 1963 (15 ख़ुरदाद 1342) के आंदोलन से पहले ही क्रांतिकारी गतिविधियों की शुरुआत कर दी थी।
फ़रवरी 1963 में प्रांतीय परिषदों के विधेयक से संबंधित जनमत-संग्रह के बाद, आयतुल्लाह ख़ामेनेई और उनके भाई सैयद मोहम्मद को आयतुल्लाह मोहम्मद हादी मिलानी की रिपोर्ट इमाम ख़ुमैनी तक पहुँचाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। यह रिपोर्ट मशहद के लोगों की उस जनमत-संग्रह के प्रति प्रतिक्रिया के बारे में थी।
सन 1963 में जब माह-ए-मुहर्रम निकट आया, तो इमाम ख़ुमैनी ने आयतुल्लाह ख़ामेनेई को यह ज़िम्मेदारी सौंपी कि वे आयतुल्लाह मिलानी, उलेमा, दीन के छात्रों और ख़ुरासान के धार्मिक वर्गों तक संदेश पहुँचाएँ, ताकि आंदोलन को जारी रखा जा सके और जनता को पहलवी शासन के प्रचार से अवगत कराया जा सके।
इन संदेशों में इमाम ख़ुमैनी ने कुछ महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। उन्होंने उलेमा और वक्ताओं से आग्रह किया था कि वे मुहर्रम की सातवीं तारीख़ से मदरसा-ए-फ़ैज़िया में हुए नरसंहार की घटनाओं को बयान करें, ताकि पहलवी शासन के अपराधों को जनता के सामने उजागर किया जा सके।
आयतुल्लाह ख़ामेनेई स्वयं इमाम ख़ुमैनी के उद्देश्यों और निर्देशों को अमल में लाने के लिए बीरजंद गए, जो उस समय जागरूक और प्रभावशाली व्यक्तियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। वहाँ आयोजित मजलिसों और मंचों पर उन्होंने मदरसा-ए-फ़ैज़िया के नरसंहार और इस्लामी समाजों पर इस्राईल के प्रभुत्व के विषय में भाषण दिए।
इन भाषणों के परिणामस्वरूप 2 जून 1963, जो सात मुहर्रम के दिन के अनुरूप था, उन्हें मशहद में गिरफ़्तार कर लिया गया। रिहाई के बाद आयतुल्लाह मोहम्मद हादी मिलानी उनकी कुशलक्षेम पूछने और मुलाकात के लिए स्वयं तशरीफ़ लाए।
आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने इमाम ख़ुमैनी की अनुपस्थिति में — जब वे नज़रबंद थे — इस्लामी आंदोलन को जारी रखने के उद्देश्य से आयतुल्लाह मिलानी के घर में आयोजित बैठकों में अपनी राजनीतिक गतिविधियाँ जारी रखीं। कुछ ही समय बाद वे हौज़ा-ए-इल्मिया क़ुम लौट आए और कुछ क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं के सहयोग से राजनीतिक गतिविधियों को संगठित किया। ये गतिविधियाँ विभिन्न बैठकों और जन-अभियानों के रूप में संचालित होती थीं।
वे उन उलेमा में शामिल थे जिन्होंने आयतुल्लाह सैयद महमूद तालक़ानी, मेहदी बाज़रगान और यदुल्लाह सहाबी के समर्थन में तार भेजा था, जिन्हें इमाम ख़ुमैनी का समर्थन करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था।
इसी दौरान और आयतुल्लाह ख़ामेनेई के मार्गदर्शन में, हौज़ा-ए-इल्मिया क़ुम के ख़ुरासानी उलेमा ने उस समय के प्रधानमंत्री हसन अली मंसूर को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने इमाम ख़ुमैनी की गिरफ़्तारी पर अपना विरोध प्रकट किया। इस पत्र के लेखकों में स्वयं आयतुल्लाह ख़ामेनेई, अबुलक़ासिम ख़ज़अली और मोहम्मद आबाई ख़ुरासानी शामिल थे।
जनवरी 1964 में, जो रमज़ानुल मुबारक के दिनों के साथ था, सैयद अली ख़ामेनेई इस्लामी आंदोलन के सिद्धांतों के प्रचार और व्याख्या के लिए सीस्तान व बलूचिस्तान प्रांत के शहर ज़ाहेदान गए। ज़ाहेदान की मस्जिदों में उनके भाषणों और जनता द्वारा उनके असाधारण स्वागत के कारण सरकार ने उन्हें पुनः गिरफ़्तार कर लिया। उन्हें क़ज़ल क़लआ जेल भेजा गया, जो उस समय राजनीतिक क़ैदियों के लिए विशेष रूप से निर्धारित थी।
4 मार्च 1964 को उन्हें इस शर्त पर रिहा किया गया कि वे तेहरान से बाहर नहीं जाएंगे। उस समय से लेकर इस्लामी क्रांति की सफलता तक उनकी गतिविधियाँ गुप्तचर एजेंसियों के अधिकारियों की निरंतर निगरानी में रहीं।
1964 के शरद ऋतु में आयतुल्लाह ख़ामेनेई क़ुम से मशहद लौट आए, जहाँ उन्होंने अपने पिता की सेवा और देखभाल के साथ-साथ शैक्षिक और राजनीतिक गतिविधियों में भी सक्रिय भाग लिया। वे उन उलेमा में शामिल थे जिन्होंने 8 फ़रवरी 1965 को उस समय की अंतरिम सरकार — अमीर अब्बास हुवैदा की सरकार — को एक पत्र लिखा, जिसमें देश की विनाशकारी स्थिति और इमाम ख़ुमैनी के निर्वासन के विरुद्ध विरोध व्यक्त किया गया था।
सैयद अली ख़ामेनेई, अब्दुर्रहीम रब्बानी शीराज़ी, अली फ़ैज़ मिश्कीनी, इब्राहीम अमीनी, महदी हाएरी तेहरानी, हुसैन अली मुन्तज़री, अहमद आज़री क़ुमी, अली क़ुद्दूसी, अकबर हाशमी रफ़्संजानी, सैयद मोहम्मद ख़ामेनेई और मोहम्मद तकी मिस्बाह यज़्दी उस ग्यारह सदस्यीय समूह के सदस्य थे, जिसका गठन हौज़ा-ए-इल्मिया क़ुम को सुदृढ़ और सुधारने तथा पहलवी शासन के विरुद्ध संघर्ष को संगठित करने के उद्देश्य से किया गया था।
यह संघर्ष विचारधारा और आस्था की बुनियाद पर आधारित था, और इसी कारण यह धीरे-धीरे व्यापक होता गया। उलेमा को इस आंदोलन का वैचारिक नेतृत्व प्राप्त था। संघर्ष के इस चरण में वे इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके थे कि संगठन के बिना सफलता संभव नहीं है, और एक संगठित व्यवस्था ही आंदोलन को सरकारी दमन और अत्याचार से सुरक्षित रख सकती है।
इमाम ख़ुमैनी के निर्वासन के दौरान इस समूह ने क्रांतिकारी गतिविधियों को जारी रखने के लिए संगठित योजना बनाई। यह समूह हौज़ा-ए-इल्मिया क़ुम के प्रारंभिक गुप्त संगठनों में गिना जाता था। हालांकि, 1966 के अंत में सवाक ने इसकी गतिविधियों का पता लगा लिया। इस खुलासे के बाद कुछ सदस्यों को गिरफ़्तार कर लिया गया, जबकि कुछ अन्य — जिनमें आयतुल्लाह ख़ामेनेई भी शामिल थे — सवाक की निगरानी और पीछा करने के दायरे में आ गए।
इसी समूह के साथ-साथ एक संगठन भी स्थापित किया गया, जिसे “जामेअ-ए-मुदर्रिसीन-ए-हौज़ा-ए-इल्मिया-ए-क़ुम” के नाम से जाना जाता था। इन बैठकों और उनमें लिए गए निर्णयों ने हौज़ा-ए-इल्मिया क़ुम के वातावरण में एक नई चेतना पैदा कर दी। इन निर्णयों को व्यवहार में लाने वाले केवल संगठन के सदस्य ही नहीं थे, बल्कि उत्साही और प्रतिभाशाली युवा उलेमा भी इस संघर्ष में सक्रिय थे।
इन गतिविधियों ने क़ुम के सीमित और जड़ वातावरण को बदल दिया तथा वहाँ वैचारिक और क्रांतिकारी चेतना को बढ़ावा दिया।
इसी दौरान आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने गुप्त रूप से “इस्लामी सरज़मीनों में भविष्य” नामक पुस्तक के अनुवाद और प्रकाशन में भाग लिया। इस पुस्तक में दो महत्वपूर्ण विषयों पर प्रकाश डाला गया था: पश्चिमी दबाव और साम्यवादी प्रचार। साथ ही इसमें इस्लामी भविष्य की एक व्यापक अवधारणा प्रस्तुत की गई थी।
सवाक ने इस पुस्तक के प्रकाशन को रोकने का प्रयास किया और उन लोगों को गिरफ़्तार कर लिया जो इसकी छपाई और प्रकाशन में शामिल थे। हालांकि, वह आयतुल्लाह ख़ामेनेई को गिरफ़्तार करने में सफल नहीं हो सकी, जिन्होंने इस पुस्तक का अनुवाद किया था।
1967 में मस्जिद-ए-गौहरशाद में सरकार विरोधी भाषण देने के कारण सैयद हसन क़ुम्मी की गिरफ़्तारी के बाद, अली ख़ामेनेई ने आयतुल्लाह मिलानी को इस गिरफ़्तारी के विरोध के लिए प्रेरित किया। बाद में सवाक ने उन्हें मशहद में आयतुल्लाह शेख मुजतबा क़ज़वीनी के जनाज़े के अवसर पर गिरफ़्तार कर लिया। रिहाई के बाद भी उन्होंने राजनीतिक क़ैदियों के साथ अपने संबंध बनाए रखे और क्रांतिकारी गतिविधियों को और अधिक मज़बूत करने में सक्रिय रहे।
ईरान भर के क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं के साथ निकट संबंधों के माध्यम से आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने प्रतिरोध आंदोलन को संगठित करने, युवा क्रांतिकारियों की वैचारिक शिक्षा देने, तथा क़ुरआन, हदीस और इमाम रूहुल्लाह ख़ुमैनी के आंदोलन पर आधारित इस्लामी विचारधारा को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने मार्क्सवादी, उदारवादी और भौतिकवादी विचारधाराओं का विरोध किया और पहलवी शासन के कठोर दबाव के बावजूद क्रांतिकारी नेटवर्क का विस्तार किया।
1968 में दक्षिणी ख़ुरासान में आए भूकंप के बाद, आयतुल्लाह ख़ामेनेई उलेमा के एक काफ़िले का नेतृत्व करते हुए फ़िरदौस पहुँचे, ताकि भूकंप पीड़ितों की सहायता की जा सके और राहत कार्यों को संगठित किया जा सके। अपने दो महीने के प्रवास के दौरान उन्होंने स्थानीय लोगों के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित किए और सभाओं तथा धार्मिक बैठकों के माध्यम से इस्लामी आंदोलन का संदेश फैलाया। इन गतिविधियों ने सवाक को चिंतित कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें फ़िरदौस छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। बाद में इराक जाकर नजफ़ में इमाम ख़ुमैनी से मिलने का उनका प्रयास भी सवाक ने विफल कर दिया, और इस्लामी क्रांति की सफलता तक उन पर देश से बाहर जाने पर प्रतिबंध लगा रहा।
ग्यारह व्यक्तियों की बैठक” में भाग लेने के कारण अली ख़ामेनेई को छह महीने की क़ैद की सज़ा सुनाई गई। जब यह निर्णय दैनिक समाचार पत्र कयहान में प्रकाशित हुआ, तो उन्होंने मशहद के उलेमा से परामर्श के बाद अपील अदालत में उपस्थित होने से इंकार कर दिया। सरकारी दबाव के बावजूद उन्होंने प्रमुख क्रांतिकारी उलेमा, जैसे महमूद तालक़ानी, मोहम्मद रज़ा सईदी, मोहम्मद जवाद बाहुनर, मोहम्मद रज़ा महदवी कनी, मुर्तज़ा मुतह्हरी, अकबर हाशमी रफ़्संजानी और फ़ज़्लुल्लाह महल्लाती के साथ अपने निकट संबंध बनाए रखे।
यद्यपि उनकी मुख्य गतिविधियों का केंद्र मशहद था, फिर भी वे तेहरान में आयोजित क्रांतिकारी बैठकों में सक्रिय रूप से भाग लेते थे, जहाँ मशहद के आसपास के गाँवों में उलेमा को भेजने की योजनाएँ बनाई जाती थीं। उन्होंने तफ़्सीर-ए-क़ुरआन की कक्षाओं, व्याख्यानों, भाषणों और सार्वजनिक संबोधनों के माध्यम से धार्मिक जागरूकता पैदा करने तथा इस्लामी आंदोलन को वैचारिक और सांस्कृतिक आधारों पर मज़बूत करने पर विशेष ध्यान दिया। आयतुल्लाह ख़ामेनेई का विश्वास था कि इस्लामी उद्देश्यों को केवल वैचारिक और सांस्कृतिक विकास के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है।
1969 में उन्होंने इस्लामी बुद्धिजीवियों और क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं के साथ ऐसी बैठकों का भी आयोजन किया, जिनका उद्देश्य विश्वविद्यालयों में मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित राजनीतिक आंदोलनों के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करना था।
अली ख़ामेनेई के अनेक इस्लामी बुद्धिजीवियों तथा महत्वपूर्ण क्रांतिकारी और धार्मिक केंद्रों के साथ घनिष्ठ संबंध थे, और वे उनके साथ सक्रिय सहयोग करते थे। उन्हें तेहरान के प्रमुख धार्मिक और राजनीतिक केंद्रों, विशेष रूप से हुसैनिया-ए-इरशाद और मस्जिद-ए-अल-जवाद, में इस्लामी संघर्ष के विषय पर भाषण देने के लिए आमंत्रित किया जाता था।
1969 के अंत में शहीद मुर्तज़ा मुतह्हरी के निमंत्रण पर हुसैनिया-ए-इरशाद में दिए गए उनके भाषणों तथा इस्लामी इंजीनियर्स एसोसिएशन के तत्वावधान में मस्जिद-ए-अल-जवाद में आयोजित उनके व्याख्यानों और संबोधनों ने युवा पीढ़ी, विशेषकर विश्वविद्यालय और हाई स्कूल के विद्यार्थियों, में राजनीतिक और धार्मिक चेतना जागृत करने में गहरा प्रभाव डाला।
1970 के वसंत ऋतु में अली ख़ामेनेई ने ऐसी बैठकों की एक श्रृंखला आयोजित की, जिनका उद्देश्य पहलवी शासन के विरुद्ध इस्लामी आंदोलन की वैचारिक नींव को मज़बूत करना था। इन बैठकों में इस्लामी दृष्टिकोण और इस्लामी विचारधारा के आधार पर संघर्ष की रणनीति पर चर्चा की जाती थी।
इन चर्चाओं में मुर्तज़ा मुतह्हरी, महमूद तालक़ानी, मेहदी बाज़रगान, अकबर हाशमी रफ़्संजानी, यदुल्लाह सहाबी, अब्बास शैबानी और काज़िम सामी जैसी प्रमुख हस्तियाँ भाग लेती थीं। इन बैठकों ने इस्लामी विचारधारा और इस्लामी विश्वदृष्टि से संबंधित अवधारणाओं को परिष्कृत और व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1970 में आयतुल्लाह मोहसिन हकीम के निधन के बाद समाज में मरजा-ए-तक़लीद के चयन का मुद्दा एक महत्वपूर्ण विषय बन गया। अली ख़ामेनेई ने आयतुल्लाह हकीम के विद्वतापूर्ण स्थान और प्रतिष्ठा को श्रद्धांजलि अर्पित की तथा इमाम रूहुल्लाह ख़ुमैनी को सर्वोच्च मरजा-ए-तक़लीद के रूप में परिचित कराने में सक्रिय भूमिका निभाई। जून 1970 में मोहम्मद रज़ा सईदी की सवाक के हाथों शहादत के बाद, आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने जनता के दुःख और आक्रोश को इमाम ख़ुमैनी के समर्थन और सरकार-विरोधी संघर्ष की दिशा में मोड़ने का प्रयास किया। उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप हौज़ा-ए-इल्मिया के छात्रों और उलेमा ने सवाक के विरोध और इस्लामी आंदोलन के समर्थन में पर्चे वितरित किए। इन गतिविधियों के कारण सवाक ने अक्टूबर 1970 में उन्हें मशहद में गिरफ़्तार कर लिया और लश्कर-ए-ख़ुरासान जेल में क़ैद कर दिया।
रिहाई के बाद भी उन्होंने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियाँ जारी रखीं। उसी वर्ष मुहर्रम के दौरान, सवाक द्वारा सार्वजनिक भाषणों पर प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद, उन्होंने तेहरान की हैअत-ए-अंसारुल हुसैन में भाषण दिए।
1971 में महमूद तालक़ानी के निमंत्रण पर उन्होंने तेहरान की मस्जिद-ए-हिदायत में भी व्याख्यान और संबोधन दिए, जो उस समय विद्यार्थियों और युवाओं के आकर्षण का एक महत्वपूर्ण केंद्र मानी जाती थी।
इमाम ख़ुमैनी द्वारा पहलवी शासन के अधीन आयोजित 2500 वर्षीय शाही समारोहों को हराम घोषित करने और उनकी कड़ी निंदा करने के बाद, सवाक ने क्रांतिकारी उलेमा की गतिविधियों के विरुद्ध अत्यंत कठोर कदम उठाने शुरू कर दिए। परिणामस्वरूप अगस्त 1971 में अली ख़ामेनेई को मशहद स्थित सवाक कार्यालय में बुलाया गया और कुछ समय के लिए लश्कर-ए-ख़ुरासान जेल में क़ैद रखा गया।
रिहाई के बाद भी उन्होंने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियाँ जारी रखीं, जिसके परिणामस्वरूप उसी वर्ष उन्हें दो और बार गिरफ़्तार किया गया। पहली गिरफ़्तारी अक्टूबर–नवंबर 1971 में हुई, जिसके बाद उन्हें थोड़े समय के लिए लश्कर-ए-ख़ुरासान जेल में रखा गया। दूसरी गिरफ़्तारी दिसंबर 1971 में हुई, और इस बार उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के विरुद्ध गतिविधियों के आरोप में तीन महीने की क़ैद की सज़ा दी गई।
रिहाई के बाद अली ख़ामेनेई ने अपनी सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों का और अधिक विस्तार किया। वे तेहरान में हैअत-ए-अंसारुल हुसैन और मस्जिद-ए-नारमक में आयोजित बैठकों में नियमित रूप से भाग लेते थे, जहाँ वे धार्मिक और राजनीतिक विषयों पर भाषण देते थे। इसके अतिरिक्त, उन्होंने मशहद में मदरसा-ए-मिर्ज़ा जाफ़र, मस्जिद-ए-इमाम हसन (अ.), मस्जिद-ए-क़िबला और अपने घर में तफ़्सीर-ए-क़ुरआन के पाठ भी जारी रखे।
इन सभाओं में विश्वविद्यालयों और विद्यालयों के विद्यार्थी, युवा उलेमा तथा समाज के विभिन्न वर्गों से संबंधित लोग भाग लेते थे। आयतुल्लाह ख़ामेनेई इन बैठकों के माध्यम से उन्हें क्रांतिकारी और राजनीतिक इस्लाम के विचारों और दर्शन से परिचित कराते थे। बाद में इन्हीं सभाओं के अनेक प्रतिभागी और विद्यार्थी इस्लामी क्रांति के उत्कर्ष के दौरान देश के विभिन्न क्षेत्रों में जन-जागरण फैलाने में प्रभावशाली भूमिका निभाने लगे।
सवाक के अधिकारी आयतुल्लाह ख़ामेनेई के भाषणों और शिक्षण सत्रों के बारे में अनेक रिपोर्टें तैयार करते थे। सवाक के दृष्टिकोण से आयतुल्लाह ख़ामेनेई जैसी हस्तियाँ हौज़ा-ए-इल्मिया के वैचारिक और क्रांतिकारी शिक्षकों में गिनी जाती थीं।
सवाक का मानना था कि ये लोग दीन के छात्रों, उलेमा और युवाओं में राजनीतिक और सामाजिक चेतना जागृत करने के साथ-साथ विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों और नई पीढ़ी के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं।
मार्च–अप्रैल 1973 में अली ख़ामेनेई क्रांतिकारी विचारों के प्रचार के लिए निशापुर गए। वहाँ की मस्जिदों में उन्होंने उसूल-ए-फ़िक़्ह के पाठ पढ़ाए, और उनकी कक्षाएँ प्रत्येक सप्ताह गुरुवार के दिन आयोजित होती थीं। मई–जून 1973 में सवाक ने मस्जिद-ए-इमाम हसन (अ.) और उनके घर में आयोजित होने वाली तफ़्सीर-ए-क़ुरआन की कक्षाओं को जारी रखने से रोक दिया।
नवंबर–दिसंबर 1973 में आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने अपनी गतिविधियों का केंद्र मस्जिद-ए-करामत को बनाया, जहाँ उन्होंने मस्जिद के संस्थापक के निमंत्रण पर नमाज़-ए-जमाअत की इमामत संभाली और तफ़्सीर-ए-क़ुरआन के पाठों का सिलसिला जारी रखा। उन्होंने इस मस्जिद को विद्यार्थियों और युवा उलेमा की गतिविधियों का एक सक्रिय केंद्र बना दिया। उनकी व्यापक राजनीतिक और क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण सवाक-ए-मशहद ने उन्हें मस्जिद में नमाज़-ए-जमाअत की इमामत से भी रोक दिया।
अक्टूबर–नवंबर 1974 में अली ख़ामेनेई ने तेहरान की मस्जिद-ए-जाविद में मोहम्मद मुफत्तह के निमंत्रण पर भाषण दिए। मोहम्मद मुफत्तह उस समय मस्जिद के इमाम-ए-जमाअत थे और उन्हें सरकार की ओर से भाषण और उपदेश देने से रोक दिया गया था। इन गतिविधियों के परिणामस्वरूप सवाक ने आयतुल्लाह मुफत्तह को गिरफ़्तार कर लिया और मस्जिद-ए-जाविद को बंद कर दिया, जो क्रांतिकारी गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुकी थी।
इसी वर्ष दिसंबर 1974 में सवाक ने आयतुल्लाह ख़ामेनेई के घर की तलाशी भी ली। सवाक के अनुसार, इस तलाशी का कारण एक निजी बैठक में दिए गए उनके वे बयान थे, जिनमें उन्होंने संघर्ष को जारी रखने तथा इस्लामी आंदोलन के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए एक संगठित संगठन स्थापित करने और उपलब्ध अवसरों का लाभ उठाने की आवश्यकता पर बल दिया था।
अंततः दिसंबर 1974 – जनवरी 1975 में आयतुल्लाह ख़ामेनेई को छठी बार गिरफ़्तार किया गया। इस बार उन्हें तेहरान की संयुक्त एंटी-सैबोटाज कमेटी की जेल में भेज दिया गया। स्वयं आयतुल्लाह ख़ामेनेई के कथन के अनुसार, इस क़ैद के दौरान उन्होंने अपने जीवन के सबसे कठिन और कठोर हालात का सामना किया। उन्हें पूरी तरह दूसरों से अलग रखा गया, और उनके परिवार को भी उनके क़ैद के स्थान के बारे में कोई सूचना नहीं दी गई।
अली ख़ामेनेई अगस्त 1975 में रिहा हुए, लेकिन इसके बाद भी वे गुप्तचर संस्थाओं की कड़ी निगरानी में रहे। उन्हें नमाज़-ए-जमाअत की इमामत, भाषण देने, शिक्षण कार्य करने, यहाँ तक कि अपने घर में तफ़्सीर-ए-क़ुरआन की कक्षाएँ आयोजित करने से भी रोक दिया गया था।
इन राजनीतिक और सुरक्षा प्रतिबंधों के बावजूद उन्होंने गुप्त रूप से तफ़्सीर-ए-क़ुरआन के पाठ, वैचारिक और क्रांतिकारी गतिविधियाँ तथा इस्लामी आंदोलन से संबंधित कार्य जारी रखे। इसी प्रकार वे इमाम ख़ुमैनी की ओर से उलेमा और धार्मिक व्यक्तित्वों तक आर्थिक सहायता पहुँचाने का कार्य भी निरंतर करते रहे।
1976 के अंत में अली ख़ामेनेई ने गुप्त रूप से “क़ुरआन में इस्लामी विचार” शीर्षक से अपनी पुस्तक “सैयद अली हुसैनी” के उपनाम से प्रकाशित की।
इसी दौरान क़ूचान में आई बाढ़ के बाद उन्होंने शहर के मदरस-ए-ओज़िया में एक राहत समूह का गठन किया, जिसका उद्देश्य पीड़ितों की सहायता करना और मानवीय आधार पर राहत गतिविधियों को संगठित करना था।
सवाक के दस्तावेज़ों के अनुसार, 1976–1977 के अंत में अली ख़ामेनेई और उनके पिता की गतिविधियों से संबंधित अनेक रिपोर्टें मौजूद हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि वे इमाम रूहुल्लाह ख़ुमैनी के समर्थन और इस्लामी आंदोलन के प्रचार में सक्रिय थे।
दिसंबर 1976 से जनवरी 1977 के दौरान आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने सरकार की आलोचना करते हुए कई भाषण दिए। इसी अवधि में उन्होंने विद्यार्थियों और युवाओं के लिए ऐसी बैठकों का भी आयोजन किया, जिनमें समाज की वैचारिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों पर चर्चा की जाती थी। साथ ही, वे तेहरान में उलेमा और दीन के छात्रों के सम्मेलनों में भी सक्रिय रूप से भाग लेते रहे।
जून 1977 में लंदन में डॉ. अली शरिअती के निधन के बाद, आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने उनकी स्मृति सभा में भाग लिया। वे डॉ. शरिअती और उनके पिता को अपनी युवावस्था के समय से, मशहद में निवास के दौरान, निकटता से जानते थे।
1 अक्टूबर 1977 को नजफ़ में इमाम रूहुल्लाह ख़ुमैनी के बड़े पुत्र आयतुल्लाह सैयद मुस्तफ़ा ख़ुमैनी की शहादत के बाद, अली ख़ामेनेई ने कुछ क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर मस्जिद-ए-मुल्ला हाशिम में एक स्मृति सभा का आयोजन किया।
इसके अतिरिक्त, उन्होंने मशहद के कई उलेमा के साथ मिलकर नजफ़ में इमाम ख़ुमैनी के नाम एक शोक-संदेश (टेलीग्राम) भी भेजा। आयतुल्लाह सैयद मुस्तफ़ा ख़ुमैनी की शहादत और उसके बाद घटित घटनाएँ इस्लामी आंदोलन के अंतिम चरण की शुरुआत का प्रतीक सिद्ध हुईं, जिसके दौरान क्रांतिकारी गतिविधियों और जनसमर्थन में उल्लेखनीय तीव्रता आ गई।
इन गतिविधियों के प्रत्युत्तर में पहलवी शासन ने राजनीतिक गतिविधियों पर कठोर प्रतिबंध लगा दिए, जबकि इससे पहले वह समाज में राजनीतिक स्वतंत्रता और खुले वातावरण के दावे करता रहा था। इसी नीति के अंतर्गत अनेक प्रमुख क्रांतिकारी व्यक्तित्वों को निर्वासित किया गया, और अली ख़ामेनेई भी उन्हीं में शामिल थे।
ख़ुरासान की पब्लिक सिक्योरिटी कमेटी ने उन्हें सीस्तान व बलूचिस्तान प्रांत के शहर ईरानशहर में तीन वर्ष के निर्वासन की सज़ा सुनाई। दिसंबर 1977 में सवाक के अधिकारियों ने उनके घर पर छापा मारा, उन्हें गिरफ़्तार किया और ईरानशहर भेज दिया।
इस कदम का उद्देश्य उन्हें जनता और क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं से अलग करना था, ताकि वे अपनी गतिविधियाँ जारी न रख सकें और सरकार के विरुद्ध आवाज़ उठाने से रुक जाएँ।
हालाँकि, इश्तेहार गाँव की स्थानीय सुन्नी आबादी के साथ अपने सकारात्मक और सौहार्दपूर्ण संबंधों के माध्यम से अली ख़ामेनेई ने ईरानशहर के लोगों के बीच विशेष लोकप्रियता प्राप्त कर ली। उन्होंने इन अवसरों का लाभ उठाते हुए देश के दूरदराज़ क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तक भी इस्लामी क्रांति का संदेश पहुँचाया।
ईरानशहर की मस्जिद-ए-आल-ए-रसूल में उनके भाषणों, तथा उनके घर पर क्रांतिकारी उलेमा, दीन के छात्रों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और समाज के विभिन्न वर्गों से संबंधित लोगों की लगातार आवाजाही के कारण गुप्तचर संस्थाओं ने उनकी गतिविधियों पर और अधिक कठोर प्रतिबंध लगा दिए तथा लोगों को उनसे मिलने से रोकने का प्रयास किया।
8 अप्रैल 1978 को यज़्द में पहलवी शासन की सुरक्षा बलों द्वारा जनता के नरसंहार के बाद, अली ख़ामेनेई ने यज़्द के इमाम-ए-जुमा आयतुल्लाह मोहम्मद सदूकी के नाम एक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने इस अत्याचारी कार्रवाई की कड़ी निंदा की, जनता को अपने संघर्ष को जारी रखने के लिए प्रेरित किया, और इस घटना के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
बाद में यह पत्र एक घोषणापत्र के रूप में पूरे देश में फैल गया और क्रांतिकारी आंदोलन के समर्थन में जारी प्रभावशाली बयानों में गिना जाने लगा।
1 जुलाई 1978 को जब ईरानशहर में भीषण बाढ़ आई, तो अली ख़ामेनेई ने राहत और बचाव कार्यों को संगठित करने के अपने पूर्व अनुभव का उपयोग करते हुए शहर में सक्रिय एकमात्र राहत दल का नेतृत्व किया। उन्होंने यज़्द, मशहद और अन्य शहरों के उलेमा के सहयोग से राहत सहायता एकत्र की और उसे बाढ़ पीड़ितों में वितरित किया।
अपने निर्वासन के दौरान भी आयतुल्लाह ख़ामेनेई ईरान के विभिन्न क्षेत्रों के प्रमुख क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं और उलेमा के साथ घनिष्ठ संपर्क में रहे। वे इस्लामी आंदोलन के संबंध में नियमित रूप से उनसे पत्राचार करते थे, जिसके माध्यम से उन्हें महत्वपूर्ण परिस्थितियों और घटनाओं की जानकारी मिलती रहती थी। इन्हीं पत्रों के द्वारा वे उलेमा के सामूहिक निर्णयों में भी सहभागी बने रहते थे।
जुलाई 1978 में जब इस्लामी क्रांति का आंदोलन तीव्र हो रहा था, तब हौज़ा-ए-इल्मिया मशहद के अनेक उलेमा ने अली ख़ामेनेई के निरंतर निर्वासन का विरोध करते हुए उनकी वापसी की माँग की। किंतु ईरानशहर में उनके बढ़ते प्रभाव और क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण गुप्तचर संस्थाओं ने 13 अगस्त 1978 को उनके निर्वासन को करमान प्रांत के शहर जीरफ़्त में स्थानांतरित कर दिया।
जीरफ़्त में अपेक्षाकृत कठिन परिस्थितियों के बावजूद आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने शहर की जामे मस्जिद में पहलवी शासन के विरुद्ध अपने भाषणों का सिलसिला जारी रखा। सितंबर 1978 में उनके एक भाषण के कारण सार्वजनिक प्रदर्शन और क्रांतिकारी नारेबाज़ी शुरू हो गई। इसी दौरान उन्होंने अन्य उलेमा के साथ मिलकर अब्दुल हुसैन दस्तग़ैब के नाम एक पत्र भी लिखा, जिसमें इस्लामी आंदोलन को जारी रखने और शासन के अपराधों की निंदा करने पर बल दिया गया था। बाद में वे गुप्त रूप से कहनूज गए, जहाँ उन्होंने सरकार-विरोधी भाषणों का क्रम जारी रखा।
जब इस्लामी क्रांति का आंदोलन तेज़ होने लगा और पहलवी शासन जनता के आंदोलन पर अपना नियंत्रण खोने लगा, तब अली ख़ामेनेई 23 सितंबर 1978 को मशहद लौट आए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों को संगठित करने और सरकार-विरोधी आंदोलन को और अधिक मज़बूत बनाने का सिलसिला जारी रखा।
इमाम रूहुल्लाह ख़ुमैनी के फ़्रांस में प्रवास के दौरान, अली ख़ामेनेई ने मशहद के कुछ क्रांतिकारी उलेमा के साथ मिलकर उनके नाम एक टेलीग्राम भेजा, जिसमें फ़्रांस में उनकी उपस्थिति को ईरान की जनता के लिए आशा, संकल्प और प्रेरणा का स्रोत बताया गया।
इस टेलीग्राम में उन्होंने इमाम ख़ुमैनी से अनुरोध किया कि वे शासन के विरुद्ध संघर्ष को जारी रखने और अपनी ईरान वापसी के लिए परिस्थितियों को अनुकूल बनाने हेतु आवश्यक निर्देश जारी करें।
कुछ ही समय में मशहद में आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की क्रांतिकारी गतिविधियों में उल्लेखनीय तीव्रता आ गई। सार्वजनिक सभाओं और प्रदर्शनों के आयोजन के अतिरिक्त, वे पहलवी शासन के विरुद्ध भाषण देते थे और इमाम रूहुल्लाह ख़ुमैनी के परिवार तथा अन्य क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखते थे।
इन्हीं संबंधों के परिणामस्वरूप 1 नवंबर 1978 को अहमद ख़ुमैनी ने पेरिस से मोहम्मद सदूकी को फ़ोन किया और इमाम ख़ुमैनी की ओर से उनसे तथा आयतुल्लाह ख़ामेनेई से मिलने की इच्छा व्यक्त की।
अली ख़ामेनेई उन उलेमा में शामिल थे जिन्होंने मशहद के सादाबाद स्टेडियम में सांस्कृतिक हस्तियों और जनसभाओं को संबोधित किया। उन्होंने अपने भाषणों में इमाम रूहुल्लाह ख़ुमैनी की वतन-वापसी और इस्लामी सरकार की स्थापना की माँग की।
नवंबर 1978 के अंतिम दिनों में वे अब्दुल करीम हाशमी नेजाद के साथ क़ूचान, शिरवान और बोझनूर्द गए, जहाँ उन्होंने क्रांति को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से विभिन्न भाषण दिए।
मशहद में उनके बढ़ते प्रभाव और क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण पहलवी शासन की गुप्तचर संस्थाओं ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। सवाक की रिपोर्टों में आयतुल्लाह ख़ामेनेई को ख़ुरासान में क्रांति की प्रमुख और प्रभावशाली हस्तियों में गिना गया था।
1978 के आशूरा के दिन अली ख़ामेनेई ने मशहद में जनता के बड़े-बड़े जनसमूहों को उत्साहपूर्ण भाषण दिए। उन्होंने इमाम रूहुल्लाह ख़ुमैनी के प्रतिनिधि के रूप में शब-ए-आशूरा का संबोधन भी किया। इस क्रांतिकारी कदम के माध्यम से उन्होंने पहलवी शासन द्वारा थोपी गई उस पुरानी परंपरा को तोड़ दिया, जिसके अंतर्गत ये समारोह औपचारिक रूप से आयोजित किए जाते थे और उनमें मोहम्मद रज़ा पहलवी के लिए दुआएँ की जाती थीं।
इसके अतिरिक्त, उन्होंने मशहद में विशाल आशूरा रैली के आयोजन में केंद्रीय भूमिका निभाई और वहाँ भाषण भी दिया। वे उन उलेमा में भी शामिल थे जिन्होंने शाह रज़ा अस्पताल (वर्तमान इमाम रज़ा अस्पताल) पर पहलवी शासन के एजेंटों द्वारा किए गए हमले के विरोध में प्रदर्शन आयोजित करने का प्रस्ताव रखा।
जब उलेमा विरोध जुलूस की ओर बढ़े, तो बड़ी संख्या में जनता भी उनके साथ शामिल हो गई। प्रदर्शनकारियों ने एक घोषणापत्र जारी किया, जिसमें पहलवी शासन के एजेंटों के अपराधों की निंदा, दोषियों को दंड देने की माँग, पहलवी शासन के अंत, और इमाम ख़ुमैनी की वतन-वापसी की माँग की गई। इन कदमों का पूरे देश में व्यापक प्रभाव पड़ा, और आंदोलन के समर्थन में असंख्य पर्चे तथा बयान प्रकाशित किए गए।
30 दिसंबर 1978 को अली ख़ामेनेई और मशहद के कुछ क्रांतिकारी उलेमा ने जनता के एक बड़े समूह का नेतृत्व करते हुए प्रांतीय गवर्नर हाउस की ओर मार्च किया, ताकि ख़ुरासान के सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को क्रांति में शामिल होने के लिए प्रेरित किया जा सके। किंतु सभा के शांतिपूर्ण होने के बावजूद, भवन के अंदर मौजूद पुलिस बलों ने प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी कर दी।
इसके परिणामस्वरूप विरोध प्रदर्शन शहर की सड़कों तक फैल गए और ऐसी अशांति उत्पन्न हुई जिसमें कई सरकारी इमारतों और केंद्रों को आग लगा दी गई। उसी रात मशहद के उलेमा, जिनमें आयतुल्लाह ख़ामेनेई भी शामिल थे, ने वार्ताओं और बैठकों के माध्यम से आगे रक्तपात रोकने का प्रयास किया। इसके बावजूद पहलवी शासन के एजेंटों ने वह नरसंहार किया, जो “10 दय 1357 का खूनी रविवार” (31 दिसंबर 1978) के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
इस घटना के बाद आयतुल्लाह ख़ामेनेई और मशहद के अन्य उलेमा ने एक संयुक्त घोषणापत्र जारी किया, जिसमें इस नरसंहार की कड़ी निंदा की गई और क्रांतिकारी आंदोलन को जारी रखने की अपील की गई।
जब पहलवी शासन के पतन की प्रक्रिया तेज़ होने लगी और इस्लामी आंदोलन की अंतिम सफलता के संकेत स्पष्ट दिखाई देने लगे, तब इमाम रूहुल्लाह ख़ुमैनी ने 12 जनवरी 1979 को इस्लामी क्रांति परिषद के गठन का आदेश जारी किया। अली ख़ामेनेई को इस परिषद के सदस्यों में शामिल किया गया, और वे जनवरी 1979 के अंतिम दिनों में मशहद — जहाँ वे क्रांतिकारी गतिविधियों में केंद्रीय भूमिका निभा रहे थे — से तेहरान रवाना हो गए। उन्होंने रिफाह स्कूल में निवास किया और मोहम्मद बेहेश्ती, मुर्तज़ा मुतह्हरी तथा मोहम्मद मुफत्तह जैसी क्रांतिकारी हस्तियों के साथ मिलकर इस्लामी क्रांति के अंतिम चरण के संगठन और भविष्य की योजना-निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाई। जब इस्लामी क्रांति परिषद की ओर से इमाम ख़ुमैनी के स्वागत के लिए एक समिति का गठन किया गया, तो आयतुल्लाह ख़ामेनेई को उसकी प्रचार और जनसंपर्क समिति की ज़िम्मेदारी सौंपी गई।
जब शाह द्वारा नियुक्त प्रधानमंत्री शापूर बख्तियार के आदेश पर ईरान के हवाई अड्डों को बंद कर दिया गया, ताकि इमाम रूहुल्लाह ख़ुमैनी की वतन-वापसी को रोका जा सके, तब अली ख़ामेनेई ने मोहम्मद बेहेश्ती और अन्य प्रमुख क्रांतिकारी उलेमा के साथ मिलकर इस निर्णय के विरोध में तेहरान विश्वविद्यालय की मस्जिद में एक बड़े धरने का आयोजन किया। जैसे-जैसे अधिक उलेमा, शिक्षक, बुद्धिजीवी और आम लोग इस विरोध में शामिल होते गए, धरना और अधिक व्यापक होता गया।
धरने से एक रात पहले आयतुल्लाह बेहेश्ती ने बहिश्त-ए-ज़हरा में भाषण दिया, जबकि आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने वह प्रस्ताव सभा के सामने पढ़ा, जिसे उन्होंने स्वयं लिखा था। यही सभा अगले दिन तेहरान विश्वविद्यालय की मस्जिद में धरने के आयोजन की आधारशिला बनी।
इस विरोध प्रदर्शन के दौरान आयतुल्लाह ख़ामेनेई और अन्य उलेमा ने विभिन्न गतिविधियों में भाग लिया, जिनमें भाषण देना, घोषणापत्र जारी करना, और “धरना” शीर्षक से एक पर्चा प्रकाशित करना शामिल था।
28 जनवरी 1979 को एक घोषणापत्र जारी करते हुए प्रदर्शनकारियों ने घोषणा की कि वे उस समय तक धरना जारी रखेंगे, जब तक हवाई अड्डे दोबारा नहीं खोले जाते और इमाम रूहुल्लाह ख़ुमैनी को ईरान लौटने की अनुमति नहीं मिल जाती। यह धरना 1 फ़रवरी की सुबह तक जारी रहा और तेहरान विश्वविद्यालय की मस्जिद को क्रांतिकारी गतिविधियों के एक महत्वपूर्ण केंद्र में बदल दिया।
1 फ़रवरी 1979 को इमाम ख़ुमैनी की ऐतिहासिक वतन-वापसी के अवसर पर अली ख़ामेनेई अनेक उलेमा और क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं के साथ मेहराबाद हवाई अड्डे पहुँचे, ताकि उनका स्वागत कर सकें। इसके बाद के दस दिनों में आयतुल्लाह ख़ामेनेई लगातार इमाम ख़ुमैनी के निकट रहे और विभिन्न मामलों में उन्हें परामर्श और सहयोग प्रदान करते रहे।
उन्होंने इमाम ख़ुमैनी की प्रचार और जनसंपर्क समिति की ज़िम्मेदारी भी स्वीकार की, ताकि देश के भीतर और बाहर के विरोधी तत्वों, अवसरवादी दलों और विभिन्न राजनीतिक समूहों के प्रचार का प्रभावी उत्तर दिया जा सके। इसी उद्देश्य से उन्होंने “इमाम” जैसे पर्चों के प्रकाशन में भी भूमिका निभाई, जिनके लिए उन्होंने स्वयं अनेक लेख लिखे और प्रकाशित किए।