उनके दादा, आयतुल्लाह सैयद जवाद हुसैनी ख़ामेनेई, का जन्म 7 दिसंबर 1895 को इराक़ के पवित्र नगर नजफ़ में हुआ था। उनका निधन 5 जुलाई 1986 को हुआ। वे अपने समय के प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों तथा उच्च कोटि के मुज्तहिदों में गिने जाते थे और अपनी गहन धार्मिक विद्वता, परहेज़गारी तथा शिक्षण-सेवा के लिए व्यापक रूप से सम्मानित थे.
उनके पिता, शहीद ग्रैंड आयतुल्लाह सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई, का जन्म 19 अप्रैल 1939 को ईरान के पवित्र नगर मशहद में हुआ। मशहद, क़ुम और नजफ़ की इस्लामी शिक्षण संस्थाओं (हौज़ा-ए-इल्मिया) में वर्षों तक अध्ययन करने के पश्चात उन्होंने इज्तिहाद की उच्च धार्मिक उपाधि प्राप्त की। युवावस्था से ही उन्होंने इमाम ख़ुमैनी के नेतृत्व में पहलवी शासन के विरुद्ध इस्लामी आंदोलन में सक्रिय भाग लिया। अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण उन्हें अनेक बार गिरफ़्तार किया गया और निर्वासन का सामना भी करना पड़ा।
इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण दायित्व निभाए। वे इस्लामिक रिवोल्यूशनरी काउंसिल के सदस्य, इस्लामिक रिपब्लिकन पार्टी के महासचिव, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने वाले वरिष्ठ अधिकारी, तेहरान के जुमे की नमाज़ के इमाम, सर्वोच्च रक्षा परिषद में इमाम ख़ुमैनी के प्रतिनिधि, ईरानी संसद के प्रथम कार्यकाल में तेहरान के जन-प्रतिनिधि, असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स के सदस्य, लगातार दो कार्यकाल तक इस्लामी गणराज्य ईरान के राष्ट्रपति तथा बाद में इस्लामी गणराज्य ईरान के सर्वोच्च नेता रहे।
अपने संपूर्ण जीवन में आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने ज्ञान, संस्कृति, न्याय, स्वतंत्रता, मुस्लिम उम्मत की एकता तथा विश्व के उत्पीड़ित राष्ट्रों—विशेषकर फ़िलिस्तीनी जनता—के समर्थन पर निरंतर बल दिया। धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर उनकी पुस्तकें, भाषण और मार्गदर्शन इस्लामी चिंतन के विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और विद्वानों के लिए अमूल्य धरोहर माने जाते हैं.
दशकों तक निरंतर संघर्ष और नेतृत्व के पश्चात, 28 फ़रवरी 2026 को उनके निवास पर हुए एक ऐसे हवाई हमले में, जिसे अमेरिका और इज़राइल द्वारा किया गया बताया जाता है, वे अपनी पुत्री, पौत्री, पुत्रवधू और दामाद के साथ शहीद हो गए। तेहरान, क़ुम, नजफ़ और कर्बला में विशाल जनाज़ा जुलूसों के बाद, 9 जुलाई 2026 को उन्हें मशहद स्थित हरम-ए-इमाम रज़ा (अ.स.) के दार-उज़-ज़िक्र रिवाक़ में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।
उन्होंने अपनी प्रारम्भिक एवं माध्यमिक शिक्षा क्रमशः मशहद और तेहरान के शैक्षणिक संस्थानों से प्राप्त की। सोलह वर्ष की आयु में, जब वे अभी छात्र ही थे, उन्होंने ईरान–इराक़ युद्ध के मोर्चों पर जाने का निर्णय लिया और 27वीं मोहम्मद रसूल अल्लाह डिवीजन की हबीब इब्न मज़ाहिर बटालियन में सेवा की। इसके अतिरिक्त, उन्होंने कुछ समय तक सैय्यद अल-शुहदा डिवीजन में भी अपनी सेवाएँ प्रदान कीं।
युद्ध के दौरान उन्होंने अनेक सैन्य अभियानों में सक्रिय रूप से भाग लिया, विशेष रूप से ऑपरेशन कर्बला-1 में, जहाँ उन्होंने अग्रिम मोर्चे पर रहकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया।
ब्रिगेडियर जनरल सरदार अली फ़ज़ली ने आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई के उस दृढ़ संकल्प को याद करते हुए बताया कि वे अपने साथी मुजाहिदीन के बीच अपनी पहचान को गुप्त रखना चाहते थे।
उन्होंने कहा, "मुझे कुछ समय तक सैय्यद अल-शुहदा डिवीजन में अपने सम्मानित भाई, आगा सैयद मुज्तबा, के साथ सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। जब वे इस डिवीजन में थे, तो उन्होंने मुझसे कहा कि उन्हें केवल 'आगा हुसैनी' कहकर पुकारा जाए। उन्होंने कहा, 'हम यहाँ पहचान, प्रतिष्ठा या व्यक्तिगत सम्मान प्राप्त करने के लिए नहीं आए हैं। हम यहाँ केवल अपने धार्मिक और क्रांतिकारी कर्तव्य का पालन करने के लिए हैं।'"
सैय्यद अल-शुहदा डिवीजन में आने से पहले आगा मुज्तबा 10वीं डिवीजन में भी अपनी सेवाएँ दे चुके थे। सैय्यद अल-शुहदा डिवीजन में उनके साथ बिताए समय के दौरान हमने उनके अनेक उत्कृष्ट गुणों को निकट से देखा।
उनकी अपेक्षाएँ अन्य मुजाहिदीन से कभी अधिक नहीं थीं, बल्कि अधिकांश समय उनसे भी कम रहती थीं। मैंने उन्हें कभी किसी विशेष सुविधा, आराम या अतिरिक्त संसाधन की माँग करते नहीं देखा। इसके विपरीत, वे उपलब्ध सबसे साधारण सुविधाओं से ही पूर्णतः संतुष्ट रहते थे।
वे सदैव वहीं रहने का प्रयास करते थे जहाँ खतरा सबसे अधिक होता था और सुरक्षित या आरामदायक स्थानों पर ठहरने से बचते थे। अग्रिम मोर्चों का नियमित दौरा करना, लड़ाकों का हालचाल जानना तथा युद्ध की अग्रिम पंक्तियों में निरंतर उपस्थित रहना उनके जीवन के स्थायी सिद्धांतों में शामिल था।
उचित अवसरों पर वे मुजाहिदीन के साथ हँसी-मज़ाक और आत्मीय बातचीत भी करते थे, जिससे युद्धभूमि में भाईचारे, स्नेह और उच्च मनोबल का वातावरण बना रहता था।
नमाज़ के प्रति उनका दृष्टिकोण भी अत्यंत विशिष्ट था। जब जमाअत की नमाज़ उपलब्ध नहीं होती थी, तो वे एकांत और पूर्ण शांति में अकेले नमाज़ अदा करना पसंद करते थे। वे जानबूझकर ऐसे सुनसान और कम रोशनी वाले स्थानों का चयन करते थे जहाँ लोगों का आना-जाना बहुत कम हो। यद्यपि अनेक तंबू उपलब्ध होते थे, फिर भी वे इबादत, दुआ और अल्लाह से निजी संवाद के लिए हमेशा सबसे दूर और निर्जन तंबू को चुनते थे। यह उनका कभी-कभार अपनाया गया तरीका नहीं था, बल्कि उनके जीवन की एक नियमित और विशिष्ट विशेषता थी।
पवित्र रक्षा (डिफ़ा-ए-मुक़द्दस) के प्रतिष्ठित कमांडर, शहीद ब्रिगेडियर जनरल नूर अली शुश्तरी ने एक ऐसे सैन्य अभियान का उल्लेख किया, जिसमें आगा सैयद मुज्तबा और उनके भाई दोनों सहभागी थे।
उन्होंने बताया, "मैंने देखा कि आगा सैयद मुज्तबा कुछ चिंतित दिखाई दे रहे थे। मैंने उनसे पूछा कि क्या बात है। उन्होंने अपने चश्मे की ओर इशारा करते हुए कहा, 'मेरा चश्मा टूट गया है।' मैंने कहा, 'इसमें चिंता की क्या बात है?' उन्होंने उत्तर दिया, 'मुझे डर है कि कहीं चश्मा ठीक कराने में देर होने के कारण मैं इस अभियान में भाग लेने से वंचित न रह जाऊँ।'
वह अत्यंत कठिन सैन्य अभियान था और यह संभावना भी थी कि कुछ लड़ाके शत्रु के हाथों बंदी बन सकते हैं। इसी कारण उसमें केवल सबसे साहसी, दृढ़ निश्चयी और त्यागी स्वयंसेवकों का ही चयन किया गया था।
मैंने चुपचाप अपने साथियों से कहा कि आगा मुज्तबा का चश्मा ठीक न कराया जाए, ताकि अन्य लड़ाके पहले रवाना हो जाएँ और वे तथा उनके भाई पीछे रह जाएँ। लेकिन जब मैं रेडियो संचार और अन्य सैन्य कार्यों में व्यस्त था, तब उन्होंने किसी तरह एक सेफ़्टी पिन की सहायता से अपने चश्मे को अस्थायी रूप से ठीक कर लिया और मोर्चे की ओर रवाना हो गए।
मैंने उन्हें रोकने की पूरी कोशिश की, किन्तु सफल न हो सका और वे युद्धभूमि की ओर बढ़ते रहे।
बाद में मैंने उनकी डिवीजन के कमांडर से संपर्क करके कहा, 'दोनों भाई मोर्चे की ओर आ रहे हैं। ध्यान रहे कि उन्हें उस प्रथम हमलावर दल में शामिल न किया जाए, जिसका दायित्व दुश्मन की रक्षा पंक्तियों को भेदना है।'
अगले दिन जब मैं अभियान क्षेत्र में पहुँचा, तो मैंने दोनों भाइयों को क़ाशान हाइट्स की अग्रिम रक्षा चौकी पर तैनात पाया। वह अत्यंत जोखिमपूर्ण स्थान था, जहाँ घायलों को सुरक्षित निकालना अत्यंत कठिन था और हथियार, गोला-बारूद तथा भोजन पहुँचाना भी एक बड़ी चुनौती थी।
मैंने हमारे भाई कमांडर फ़ज़ली से कहा, 'जनाब फ़ज़ली, ये दोनों अत्यंत ख़तरनाक स्थान पर पहुँच गए हैं। यदि ये शहीद हो जाएँ तो वह हमारी चिंता का विषय नहीं होगा, लेकिन ख़ुदा न करे यदि ये दुश्मन के हाथों बंदी बना लिए गए, तो हमारे लिए गंभीर प्रचारात्मक परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं।'
उन्होंने उत्तर दिया, 'मैंने पिछली रात उन्हें रोकने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन वे अपने दृढ़ संकल्प और स्वेच्छा से मोर्चे पर जाने के लिए अडिग थे।'"
आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई ने वर्ष 1985 में तेहरान स्थित आयतुल्लाह मुज्तहिदी मदरसे में अपनी हौज़ा-ए-इल्मिया की शिक्षा प्रारम्भ की। वर्ष 1989 में वे अपनी उच्च धार्मिक शिक्षा जारी रखने के लिए क़ुम के हौज़ा-ए-इल्मिया चले गए।
उन्होंने हौज़ा की उच्च स्तरीय शिक्षा (सुतूह अल-उल्या) आयतुल्लाह अहमदी मियानजी, आयतुल्लाह रज़ा उस्तादी, आयतुल्लाह औसती तथा हौज़ा-ए-इल्मिया के अन्य प्रतिष्ठित उस्तादों के मार्गदर्शन में सफलतापूर्वक पूर्ण की।
वर्ष 1992 में उन्होंने शहीद ग्रैंड आयतुल्लाह सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई द्वारा दिए जाने वाले ख़ारिज-ए-फ़िक़्ह के जिहाद अध्याय के व्याख्यानों में नियमित रूप से भाग लेना प्रारम्भ किया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने आयतुल्लाह हाज शेख मुज्तबा तेहरानी द्वारा संचालित ख़ारिज-ए-फ़िक़्ह व उसूल के उच्च स्तरीय पाठ्यक्रमों से भी लाभ प्राप्त किया।
इसी अवधि के दौरान उन्होंने विभिन्न शैक्षणिक विषयों का अध्ययन जारी रखा तथा अंग्रेज़ी भाषा का एक विशेषीकृत पाठ्यक्रम भी सफलतापूर्वक पूर्ण किया।
1997 में आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई ने शहीद ज़हरा हद्दाद-आदिल से विवाह किया। उसी वर्ष वे अपनी हौज़ा-ए-इल्मिया की शिक्षा पूर्ण करने तथा आध्यात्मिक एवं बौद्धिक विकास को आगे बढ़ाने के लिए क़ुम लौट आए। वहाँ उन्होंने लगातार सत्रह वर्षों तक ग्रैंड आयतुल्लाह हुसैन वहीद ख़ुरासानी, ग्रैंड आयतुल्लाह शेख जवाद तबरीज़ी, ग्रैंड आयतुल्लाह सैयद मूसा शुबैरी ज़ंजानी तथा ग्रैंड आयतुल्लाह शेख मोहम्मद मोमिन क़ुमी के ख़ारिज-ए-फ़िक़्ह व उसूल के उच्च स्तरीय पाठ्यक्रमों में नियमित रूप से भाग लिया।
उनकी शैक्षणिक गतिविधियों में अरबी भाषा में विस्तृत व्याख्यान-नोट्स तैयार करना, हौज़ा के उच्च स्तरीय पाठों का गहन अध्ययन एवं विश्लेषण करना, तथा प्रमुख इस्लामी विद्वानों के साथ आलोचनात्मक संवाद, विद्वत्तापूर्ण बहस और जटिल फ़िक़्ही विषयों पर गंभीर विचार-विमर्श करना शामिल था। उनकी इन बौद्धिक और शोधपरक गतिविधियों ने हौज़ा-ए-इल्मिया के अनेक प्रतिष्ठित उस्तादों का विशेष ध्यान और प्रशंसा प्राप्त की।
उनकी असाधारण बुद्धिमत्ता, अटूट परिश्रम, धैर्य, शोधपरक सूक्ष्मता और स्वतंत्र बौद्धिक दृष्टिकोण ने इस्लामी ज्ञान-विज्ञान, विशेषकर फ़िक़्ह (इस्लामी न्यायशास्त्र), उसूल-ए-फ़िक़्ह (इस्लामी न्यायशास्त्र के सिद्धांत) तथा इल्म-उर-रिज़ाल (हदीस के वर्णनकर्ताओं के मूल्यांकन का विज्ञान) के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण और स्थायी योगदान दिया।
उनकी विद्वत्ता की एक विशिष्ट विशेषता यह रही है कि उन्होंने इस्लामी शिक्षाओं पर आधारित एक सुसंगत, व्यवस्थित और ठोस बौद्धिक पद्धति को सदैव अपनाया। यही दृष्टिकोण उनके शोध, लेखन और अकादमिक कार्यों में निरंतर दिखाई देता है तथा इसे उनकी विद्वतापूर्ण पहचान की प्रमुख विशेषताओं में से एक माना जाता है।
आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई को शेख मुर्तज़ा अल-अंसारी, आख़ुंद ख़ुरासानी, मिर्ज़ा नाइनी, आका ज़िया अल-इराक़ी, मुहक़्क़िक़ इस्फ़हानी, इमाम ख़ुमैनी, ग्रैंड आयतुल्लाह बुरूजर्दी, ग्रैंड आयतुल्लाह ख़ोई तथा शहीद आयतुल्लाह मुहम्मद बाक़िर अल-सद्र के फ़िक़्ही और उसूली विचारधाराओं का व्यापक एवं गहन ज्ञान प्राप्त है। इस विस्तृत विद्वत्तापूर्ण आधार ने उनके बौद्धिक सिद्धांतों और न्यायशास्त्रीय कार्य-पद्धति को और अधिक सुदृढ़, समृद्ध तथा परिपक्व बनाया है।
उनकी विद्वत्तापूर्ण पद्धति की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि वे मासूम इमामों (अ.स.) के सहाबा एवं साथियों की परंपराओं और शिक्षाओं, प्रारम्भिक फ़ुक़हा (इस्लामी विधिवेत्ताओं) के मतों तथा विशेष रूप से मासूम इमामों (अ.स.) के युग में मोमिनों की स्थापित धार्मिक परंपरा (*इर्तिकाज़ अल-मुतशर्रिआ फ़ी अस्र अल-मासूम*) को अत्यधिक महत्व देते हैं। वे इस सिद्धांत को इस्लामी शरीअत के विधिक निर्णयों (अहकाम) के प्रतिपादन का एक मूलभूत आधार मानते हैं।
आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई के व्यक्तित्व का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उन्हें इस्लामी अख़लाक़ (नैतिकता) और इरफ़ान (आध्यात्मिक ज्ञान) के महान उस्तादों का सान्निध्य प्राप्त हुआ। इनमें ग्रैंड आयतुल्लाह बहाउद्दीनी, ग्रैंड आयतुल्लाह बहजत, ग्रैंड आयतुल्लाह कश्मीरी, शेख जाफ़र मुज्तहिदी तथा अनेक अन्य प्रसिद्ध आध्यात्मिक विद्वान शामिल थे। उनके मार्गदर्शन, संगति और आध्यात्मिक प्रशिक्षण ने आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई के आध्यात्मिक, नैतिक और बौद्धिक विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई ने अपनी उच्च धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ फ़िक़्ह (इस्लामी न्यायशास्त्र) और उसूल-ए-फ़िक़्ह (इस्लामी न्यायशास्त्र के सिद्धांत) का अध्यापन भी प्रारम्भ कर दिया था। उन्होंने अपने शिक्षण जीवन की शुरुआत तेहरान के हौज़ा-ए-इल्मिया में प्रारम्भिक स्तर के पाठ्यक्रमों के अध्यापन से की। बाद में, शहीद ग्रैंड आयतुल्लाह सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई के इस सुझाव के अनुरूप कि हौज़ा में शैक्षणिक सुधार आवश्यक है और शहीद आयतुल्लाह मुहम्मद बाक़िर अल-सद्र की रचनाओं को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, उन्होंने मआलिम का अध्यापन बंद कर दिया और आयतुल्लाह अल-सद्र की प्रसिद्ध कृति हलक़ात फ़ी उसूल अल-फ़िक़्ह का अध्यापन प्रारम्भ किया।
पवित्र नगर क़ुम आने के बाद उन्होंने इमाम ख़ुमैनी के भवन (बैत-ए-इमाम ख़ुमैनी) में रसाइल और अल-मकासिब का अध्यापन प्रारम्भ किया। इसके साथ ही वे उसूल-ए-फ़िक़्ह पर आधारित प्रसिद्ध हलक़ात श्रृंखला के पाठ्यक्रम भी संचालित करने लगे। वर्ष 2007 में उनकी कक्षाएँ फ़ैज़िय्या मदरसे में स्थानांतरित हुईं, जहाँ उनका विद्वतापूर्ण अध्ययन-मंडल उल्लेखनीय रूप से विस्तृत हुआ।
वर्ष 2008 में उन्होंने क़ुम स्थित ग्रैंड आयतुल्लाह सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई के कार्यालय में नमाज़ (सलात) विषय पर ख़ारिज-ए-फ़िक़्ह का एक विशेष उच्च स्तरीय पाठ्यक्रम प्रारम्भ किया। इसके पश्चात 2009 के शैक्षणिक वर्ष के आरम्भ में अपने विद्यार्थियों के अनुरोध पर उन्होंने ख़ारिज-ए-फ़िक़्ह का नियमित सार्वजनिक पाठ्यक्रम भी शुरू किया।
एक वर्ष बाद, 2010 में, उन्होंने उसूल-ए-फ़िक़्ह के ख़ारिज स्तर के सार्वजनिक पाठ्यक्रम का औपचारिक शुभारम्भ किया। उसूल-ए-फ़िक़्ह के प्रारम्भिक अध्यायों से आरम्भ होकर यह पाठ्यक्रम क्रमबद्ध रूप से इस्तिशाब (निरंतरता के सिद्धांत) की चर्चा तक पहुँचा। यह उनकी व्यवस्थित, गहन और व्यापक शिक्षण-पद्धति तथा उच्च इस्लामी अध्ययन के प्रति उनके समर्पण का उत्कृष्ट उदाहरण है।
आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई प्रत्येक व्याख्यान से पूर्व अपने शोध-विषयों का अत्यंत सावधानीपूर्वक अध्ययन करते और उन्हें लिखित रूप में सुव्यवस्थित करते थे। प्रत्येक पाठ के उपरांत वे फ़िक़्ह (इस्लामी न्यायशास्त्र) तथा उसूल-ए-फ़िक़्ह (इस्लामी न्यायशास्त्र के सिद्धांत) से संबंधित अपने शोध एवं निष्कर्षों को भी लिखित रूप में संकलित करते थे। उनके इन शोध-ग्रंथों के अनेक खंड प्रकाशन के लिए तैयार किए जा चुके हैं।
उनके व्याख्यानों को उनके अनेक विद्यार्थियों ने वर्षों पहले लिपिबद्ध कर संकलित किया था। किन्तु उनकी इच्छा के अनुरूप इन व्याख्यान-नोट्स को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित नहीं किया गया। बाद में विद्वानों और विद्यार्थियों के बार-बार अनुरोध पर इन्हें केवल सीमित संख्या में शोधकर्ताओं तथा हौज़ा-ए-इल्मिया के चुनिंदा सदस्यों के लिए उपलब्ध कराया गया।
उनकी शिक्षण-पद्धति की सबसे प्रमुख विशेषताओं में से एक अपने विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास के प्रति उनका असाधारण समर्पण तथा उनके शैक्षणिक प्रश्नों को अत्यधिक महत्व देना था। औपचारिक कक्षाएँ समाप्त होने के बाद भी अनेक विद्यार्थी व्यक्तिगत मुलाक़ातों और लिखित संवाद के माध्यम से उनसे अपने प्रश्नों पर विस्तृत चर्चा करते रहते थे। वे अत्यंत धैर्य, उदारता और हार्दिक उत्साह के साथ उनके प्रत्येक प्रश्न का उत्तर देते थे।
उनकी शिक्षण-पद्धति का एक अन्य विशिष्ट पक्ष विद्यार्थियों में आलोचनात्मक चिंतन (Critical Thinking) को विकसित करना, उनमें स्वतंत्र रूप से शरीअत के विधिक निर्णय (इस्तिनबात) निकालने की क्षमता का निर्माण करना तथा फ़िक़्ही विषयों के शोध, विश्लेषण और अकादमिक प्रस्तुतीकरण का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करना था।
वर्ष 2022 के शैक्षणिक सत्र के प्रारम्भ में आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई के ख़ारिज-ए-फ़िक़्ह के उच्च स्तरीय पाठ्यक्रम में 1,300 से अधिक विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया था। ऐसे समय में, नए शैक्षणिक वर्ष के प्रथम ही व्याख्यान में उनके द्वारा इस पाठ्यक्रम को स्थगित करने की घोषणा ने विद्यार्थियों और उपस्थित श्रोताओं सभी को आश्चर्यचकित कर दिया।
इस घोषणा के बाद उन्हें अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने के लिए अनेक प्रयास किए गए। क़ुम के हौज़ा-ए-इल्मिया के एक हज़ार विद्यार्थियों और उस्तादों के एक समूह ने शहीद ग्रैंड आयतुल्लाह सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई को एक पत्र लिखकर अनुरोध किया कि इस पाठ्यक्रम को पुनः प्रारम्भ कराया जाए। इसके अतिरिक्त, क़ुम के अनेक वरिष्ठ विद्वानों ने भी व्यक्तिगत रूप से यही इच्छा व्यक्त की।
किन्तु अपने कुछ पुराने विद्यार्थियों के साथ एक बैठक में आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई ने स्पष्ट किया कि इस पाठ्यक्रम के स्थगन का कारण एक आध्यात्मिक एवं अत्यंत व्यक्तिगत विषय है, जिसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि कोविड-19 महामारी के बाद हौज़ा-ए-इल्मिया के अनेक प्रतिष्ठित उस्तादों की कक्षाओं में विद्यार्थियों की संख्या उल्लेखनीय रूप से कम हो गई थी, जबकि कुछ पाठ्यक्रम पूर्णतः बंद हो चुके थे। ऐसी परिस्थितियों में उन्हें यह उचित नहीं लगा कि केवल उनकी कक्षाओं में ही इतनी बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहें। इसलिए उन्होंने अनुरोध किया कि उनके व्याख्यानों को पुनः प्रारम्भ करने के संबंध में सभी सार्वजनिक और व्यक्तिगत आग्रह समाप्त कर दिए जाएँ।
इसी अवसर पर उन्होंने अपने विद्यार्थियों को यह सलाह दी:
"मेरी कक्षाओं में आने वाले विद्यार्थियों और हौज़ा के छात्रों को अन्य उस्तादों के व्याख्यानों से भी लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित करें।"
उन्होंने आगे कहा कि एक आदर्श शिक्षक में तीन मूलभूत गुणों का होना आवश्यक है—गहन विद्वत्ता, इस्लामी क्रांति के प्रति प्रतिबद्धता तथा चरित्र और आत्मा की पवित्रता।
प्रारम्भ में अनिच्छा व्यक्त करने के बावजूद, अपने सहयोगियों के आग्रह तथा इस्लामी क्रांति के शहीद नेता के अल-उरवतुल वुस्का पर टीका (शरह) लिखने के मार्गदर्शन के अनुरूप, आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई ने स्वयं को इस महत्वपूर्ण शैक्षणिक परियोजना के लिए समर्पित कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने फ़िक़्ह और उसूल-ए-फ़िक़्ह पर अपने उच्च स्तरीय व्याख्यानों के पुनरीक्षण, परिष्कार और विस्तार पर भी विशेष ध्यान दिया।
इसी अवधि में, इस्लामी क्रांति के शहीद नेता द्वारा हौज़ा-ए-इल्मिया-ए-क़ुम में फ़िक़्ही व्यवस्था को सुदृढ़ और सुधारने की दूरदर्शी परिकल्पना से प्रेरित होकर, आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई ने अनेक क्रांतिकारी शैक्षणिक एवं फ़िक़्ही संस्थानों का मार्गदर्शन और पर्यवेक्षण संभाला, जो विभिन्न अकादमिक रुचियों और फ़िक़्ही कार्य-पद्धतियों का प्रतिनिधित्व करते थे। इसके अतिरिक्त, उन्होंने उच्च इस्लामी शिक्षा के उद्देश्य से अनेक शैक्षणिक केंद्रों तथा फ़िक़्ही हौज़ा-ए-इल्मिया की भी स्थापना की।
ज्ञान की खोज के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता, सामाजिक उत्तरदायित्व की प्रबल भावना तथा वंचित और कमज़ोर वर्गों की सेवा के प्रति विशेष संवेदनशीलता ने इन संस्थानों के भीतर एक व्यापक शैक्षणिक एवं नैतिक प्रशिक्षण व्यवस्था को जन्म दिया। परिणामस्वरूप, इन संस्थानों ने ऐसे विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं की एक विशिष्ट पीढ़ी तैयार की, जो ईमानदारी, क्रांतिकारी सोच और समाज-सेवा की भावना से ओत-प्रोत है।
आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई के व्यक्तित्व की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक यह है कि उन्होंने सदैव इस बात का विशेष ध्यान रखा कि उनकी अपनी व्यक्तिगत पहचान इन संस्थानों का केंद्रबिंदु न बने। इसके विपरीत, उन्होंने निरंतर हौज़ा-ए-इल्मिया-ए-क़ुम को सुदृढ़ बनाने, क्रांतिकारी हौज़वी आंदोलन को संगठित करने तथा इमाम ख़ुमैनी और शहीद ग्रैंड आयतुल्लाह सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई तथा उनकी बौद्धिक विरासत की केंद्रीय भूमिका को सुरक्षित रखने पर बल दिया। व्यक्तिगत अथवा संस्थागत प्रतिस्पर्धा से उनके सजग परहेज़ ने उन्हें अनेक प्रमुख विद्वानों का सम्मान और प्रशंसा दिलाई। परिणामस्वरूप, बड़ी संख्या में उस्तादों, शोधकर्ताओं और हौज़ा-ए-इल्मिया के विद्यार्थियों ने इन शैक्षणिक केंद्रों और फ़िक़्ही संस्थानों के साथ गहरी रुचि और प्रतिबद्धता के साथ स्वयं को जोड़ा।
आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई को अपने सम्मानित पिता का विशेष स्नेह और मार्गदर्शन प्राप्त था। उन्हीं की देखरेख में उनके व्यक्तित्व का निर्माण नैतिकता, आध्यात्मिकता और तक़वा (ईश्वर-भय एवं धर्मपरायणता) के मूल्यों पर हुआ। इस विशेष संबंध की झलक उस हस्तलिखित समर्पण-पत्र में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जिसे इस्लामी क्रांति के शहीद नेता ने अपने पुत्र को भेंट की गई एक पुस्तक के प्रारम्भ में लिखा था:
अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त कृपालु और असीम दयावान है।
"मैं यह मूल्यवान पुस्तक अपने प्रिय पुत्र मुज्तबा हुसैनी को समर्पित करता हूँ। मैं सर्वशक्तिमान अल्लाह से प्रार्थना करता हूँ कि वह उन्हें इस्लाम और मुसलमानों के लिए लाभ एवं कल्याण का स्रोत बनाए, अपनी दिव्य मार्गदर्शना से उनका पथ-प्रदर्शन करे, उनके क़दमों को दृढ़ रखे, उन्हें भूल और पथभ्रष्टता से सुरक्षित रखे तथा उनके कथन और कर्म—दोनों में उन्हें त्रुटियों और कमियों से महफ़ूज़ रखे।"
अल्लाह का सबसे विनम्र बंदा,
अली हुसैनी ख़ामेनेई
ग्रैंड आयतुल्लाह सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई अपने पुत्रों को सदैव सांसारिक सुख-सुविधाओं और भौतिक आसक्तियों से दूर रहने की शिक्षा देते थे। इसी मार्गदर्शन का अनुसरण करते हुए आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई ने हौज़ा-ए-इल्मिया के एक विद्यार्थी के अनुरूप अत्यंत सादा, विनम्र और संयमपूर्ण जीवन अपनाया। इसके अतिरिक्त, क़ुम और तेहरान में अपने अध्ययन तथा शिक्षण के पूरे कालखंड में उन्होंने स्वयं को यथासंभव प्रचार, प्रसिद्धि और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से दूर रखा तथा सदैव गुमनामी और विनम्रता के साथ अपने शैक्षणिक एवं धार्मिक दायित्वों का निर्वहन किया।
कई वर्षों तक आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई ने ग्रैंड आयतुल्लाह सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई की सेवा में विविध प्रकार की ज़िम्मेदारियों का निर्वहन किया। कभी वे उनके प्रतिनिधि के रूप में आधिकारिक निर्देशों के क्रियान्वयन की निगरानी करते थे, तो कभी नेता और देश के राजनीतिक, सैन्य, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा अन्य सरकारी संस्थानों एवं वरिष्ठ अधिकारियों के बीच समन्वय स्थापित करने का दायित्व निभाते थे।
इस्लामी क्रांति के शहीद नेता के किसी भी पुत्र का किसी राजनीतिक दल से संबंध नहीं था। तथापि, इसका अर्थ यह नहीं था कि शहीद नेता ने अपने पुत्रों—विशेषकर आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई—की राजनीतिक एवं सामाजिक क्षमताओं का उपयोग अपनी नेतृत्व संबंधी ज़िम्मेदारियों के निर्वहन में न किया हो।
राजनीतिक मामलों, सैन्य नेतृत्व तथा राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों से संबंधित विषयों में शहीद नेता प्रायः आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई की योग्यता, विवेक और सेवाओं पर भरोसा करते थे। किंतु इसका अर्थ यह कदापि नहीं था कि वे राज्य के मामलों में कोई स्वतंत्र अधिकार रखते थे अथवा अलग से हस्तक्षेप करते थे। बल्कि वे अपने पिता के एक विश्वसनीय सहयोगी, गोपनीय सहायक और भरोसेमंद प्रतिनिधि के रूप में उनके नेतृत्व संबंधी दायित्वों के निर्वहन में सहायता करते थे।
इन ज़िम्मेदारियों के माध्यम से आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई को दो दशकों से अधिक समय तक देश के राजनीतिक, सैन्य और प्रशासनिक मामलों का निकट से अनुभव प्राप्त हुआ। इस पूरे काल में वे अपने शहीद पिता के विश्वसनीय साथी, भरोसेमंद हमराज़ और निष्ठावान सलाहकार के रूप में उनके साथ रहे तथा राज्य के अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों, नियुक्तियों और प्रमुख राष्ट्रीय मामलों के प्रत्यक्ष साक्षी बने।
जो लोग इस्लामी क्रांति के शहीद नेता की प्रशासनिक कार्यशैली से भली-भाँति परिचित हैं, वे इस बात की पुष्टि करते हैं कि देश के शासन-प्रशासन में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप से सदैव दूर रहने के बावजूद, उनके पुत्र ने इन वर्षों के दौरान एक ईमानदार सहयोगी, विश्वसनीय सलाहकार और समर्पित सेवक के रूप में पूरी निष्ठा के साथ अपने पिता के दायित्वों के निर्वहन में उनका साथ दिया।
राष्ट्र के प्रमुख मामलों की गहन समझ, शासन-प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ निकट कार्य-संबंध, वर्षों तक अनेक महत्वपूर्ण परामर्शात्मक एवं प्रशासनिक बैठकों में सक्रिय सहभागिता, विभिन्न शैक्षणिक विषयों का व्यापक अध्ययन, अग्रणी विद्वानों एवं बुद्धिजीवियों के साथ निरंतर संवाद तथा शासन-व्यवस्था से संबंधित बड़े और छोटे दोनों प्रकार की चुनौतियों के लिए उपयुक्त एवं प्रभावी समाधान प्रस्तुत करने की क्षमता—इन सभी ने मिलकर आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई को इस्लामी क्रांति के नेतृत्व हेतु गहन बौद्धिक ज्ञान और समृद्ध व्यावहारिक अनुभव प्रदान किया है।
आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई के सार्वजनिक जीवन का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष वरिष्ठ सैन्य कमांडरों तथा प्रतिरोध धुरी (Axis of Resistance) के नेताओं के साथ उनके दीर्घकालिक और घनिष्ठ संबंध रहे हैं। विशेष रूप से, शहीद-ए-मुक़ावमत सैयद हसन नसरुल्लाह तथा शहीद कमांडर जनरल क़ासिम सुलेमानी के साथ उनके निकट संबंध उल्लेखनीय रहे हैं।
इन्हीं कारणों से संयुक्त राज्य अमेरिका और ज़ायोनी शासन अनेक वर्षों से उनके प्रति गहरी शत्रुता रखता आया है। इस शत्रुता का प्रदर्शन उनके व्यक्तित्व को बदनाम करने के निरंतर प्रयासों, उन्हें शारीरिक रूप से निशाना बनाने की योजनाओं तथा विभिन्न प्रकार की मौखिक और व्यावहारिक धमकियों के माध्यम से किया गया, ताकि उन्हें इस्लामी व्यवस्था के नेतृत्व के लिए चुने जाने से रोका जा सके। किन्तु इमाम अल-महदी (अल्लाह उनके शुभ पुनर्प्रकट होने में शीघ्रता प्रदान करे) की कृपा और अनुकम्पा से अब तक ये सभी शत्रुतापूर्ण प्रयास पूर्णतः असफल सिद्ध हुए हैं।
28 फ़रवरी 2026 को ग्रैंड आयतुल्लाह सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई की शहादत के पश्चात, जो संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल द्वारा सुप्रीम लीडर के आधिकारिक निवास पर किए गए हवाई हमले के परिणामस्वरूप हुई, मजलिस-ए-ख़ुब्रेगान (विशेषज्ञों की परिषद) ने भारी बहुमत से आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई को इस्लामी गणराज्य ईरान का तीसरा सुप्रीम लीडर निर्वाचित किया।
इस उत्तरदायित्व को ग्रहण करने के उपरान्त उन्होंने इस्लामी क्रांति के आदर्शों की रक्षा, राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने, देश की स्वतंत्रता एवं संप्रभुता की सुरक्षा, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक प्रगति को आगे बढ़ाने, सामाजिक न्याय को प्रोत्साहित करने तथा विश्वभर के उत्पीड़ित लोगों के समर्थन पर विशेष बल दिया। उन्होंने एकता, आपसी समन्वय और दृढ़ता का आह्वान करते हुए इस बात पर भी ज़ोर दिया कि इस्लामी व्यवस्था का नेतृत्व इस्लामी गणराज्य ईरान के संविधान तथा इस्लाम के सिद्धांतों और मूल्यों के अनुरूप निरंतर आगे बढ़ता रहेगा।